आलेख: झूठे वादों की सियासत,इंतजार का सच- सुरेन्द्र धनेत्रा

आलेख: झूठे वादों की सियासत,इंतजार का सच।
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जन संवाद ( बात जन मन की ) – अब उत्तराखंड में भी विधानसभा चुनाव की लगभग-लगभग रणभेरी बज ही चुकी है। संभावित चुनाव लडने वाले नेताओं और उनके ठेकेदार नुमा दलालों की सरगर्मियां सोशल मीडिया पर उतरने लगी हैं।अब हम आम जनता को सचेत और सतर्क रहने की जरूरत है इसलिए कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद आखिरकार आम आदमी को फायदा हुआ ही क्या?, हालात उत्तर प्रदेश में रहते हुए से भी ज्यादा बदतर हो गए।आप अपने आसपास देखिए जो लोग क्या थे और आज लूट-खसोट करके कहां पहुंच गए।बस इससे सीखने और संभलने की आवश्यकता है।

अब आते हैं असल मुद्दे पर,चुनाव आते ही नेताओं की जुबान पर विकास की गंगा बहने लगती है। मंच से जो वादे फेंके जाते हैं,वो इतने बड़े होते हैं कि जनता उन्हें अपनी झोली में समेट ही नहीं पाती। सड़क, बिजली,पानी,रोजगार,अस्पताल हर समस्या का समाधान पांच साल के झूठे अनुबंध पर मिल जाता है। फिर वोट पड़ते ही वो अनुबंध किसी फाइल में दब जाता है।आप खुद आंकलन करिए और अपने गांव की हालत भी देखिए।समझ आ जाएगा। बहुत ज्यादा खुश कोन हैं जो जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर कमा रहे हैं।

आजकल राजनीति का सबसे आसान हथियार बन गया है ‘झूडे वादों का जुमला’। भाषण में आंकड़े ऐसे पेश किए जाते हैं जैसे कल सुबह सब बदल जाएगा। 100 दिन में महंगाई खत्म, हर हाथ को काम, हर खेत को पानी। सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन जमीन पर उतरते-उतरते ये वादे नेताओं के पोस्टर से भी उतर जाते हैं।

समस्या सिर्फ झूठे वादों की नहीं है। समस्या उस व्यवस्था की है जहां जवाबदेही नहीं पूछी जाती। नेता जानता है कि पांच साल बाद जनता पिछला भूल जाएगी। नए वादे, नया चेहरा, नया नारा फिर से काम कर जाएगा। इस चक्र में फंसकर आम आदमी हर चुनाव में उम्मीद का पर्चा भरता है और नतीजे के दिन खाली हाथ लौटता है।

जनप्रतिनिधि शब्द का मतलब है जनता का प्रतिनिधित्व करना। पर अब ये प्रतिनिधित्व सिर्फ टीवी डिबेट और सोशल मीडिया तक सिमट गये हैं। गांव की टूटी या नयीं सड़क सिर्फ सांसद या विधायक के ट्वीट से नहीं बनती। बेरोजगार का फॉर्म मंत्री के रील से नहीं भरता। लेकिन प्रचार का तरीका ऐसा है कि काम से ज्यादा काम का शोर सुनाई देता है।

इसका मतलब ये नहीं कि सब नेता एक जैसे हैं। कुछ ईमानदारी से कोशिश भी करते हैं। पर सिस्टम ऐसा है कि अच्छा आदमी भी वादों के जाल में उलझ जाता है। क्योंकि जीतने के लिए झूठ बोलना पड़ता है। और बोलने के लिए वो बोलना पड़ता है जो जनता सुनना चाहती है, न कि जो सच है।

समाधान क्या है? पहला, जनता को अपना मेमोरी कार्ड मजबूत करना होगा। जो कहा गया, वो लिखा जाए। जो किया गया, वो गिना जाए। दूसरा, वादे नहीं विजन पर वोट हो। तीसरा, सवाल पूछने की आदत डाली जाए। मंच से उतरते ही नेता से पूछा जाए कि पिछली बार वाला वादा कहां गया।

लोकतंत्र में नेता ताकतवर नहीं होता, जनता ही सबकुछ होती है यानी जनता देश की मालिक होती है। जब तक जनता सिर्फ सुनकर ताली बजाएगी तबतक मंच से झूठे वादे हमेशा गूंजते रहेंगे। जिस दिन जनता हिसाब मांगने लगेगी, उसी दिन से वादे हकीकत में बदलने लगेंगे।

क्योंकि कुर्सी स्थायी नहीं होती, कुर्सी पर बैठाने वाले स्थायी होते हैं।

लेखक – सुरेन्द्र धनेत्रा

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Author: BSNK NEWS

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