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आईआईटी मंडी के फैकल्टी की पुस्तक ‘द पॉलिटिक्स ऑफ एथनिक रिन्यूवल इन दार्जिलिंग’ का हुआ लोकार्पण

बीएसएनके न्यूज डेस्क। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान स्कूल में एसिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नीलांबर छेत्री की पुस्तक ‘द पॉलिटिक्स ऑफ एथनिक रिन्यूवल इन दार्जिलिंग’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक का प्रकाशन रूटलेज ने किया है। यह पुस्तक हाल के वर्षों में दार्जिलिंग की एथनिक राजनीति पर एक रोचक विमर्श है।

पुस्तक में यह विमर्श है कि कैसे इस क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता दिए जाने की मांग बढ़ी है। राष्ट्र-राज्य के परिदृश्य में अपनापन, अधिकार और स्वायत्तता की खोज में उनके लंबे सफर में यह एक ऐतिहासिक घटना का प्रतीक है। पुस्तक का दृष्टिकोण अनुभव पर आधारित है जिसके तहत एथनिक प्रथाओं के विभिन्न रूपों की तहकीकात की गई है और पहाड़ियों में एथनिक आंदोलन के जटिल विमर्श को समझने का प्रयास किया गया है। इसलिए इसे समकालीन भारत में वर्गीकरण और कैटेगराइजेशन की व्यापक राजनीति से जोड़ा जा सकता है।

पुस्तक का दायरा बड़ा है। एक अलग राज्य के गठन की मांग से लेकर अनुसूचित जनजातियों के रूप में मान्यता के लिए वर्तमान संघर्षों तक इसमें दार्जिलिंग में झुलसती एथनिक-राजनीति की गहरी समझ प्रस्तुत की गई है।

पुस्तक के बारे में बात करते हुए आईआईटी मंडी के डॉ. नीलाम्बर छेत्री ने कहा, “यह पुस्तक सामयिक महत्व की है। यह एक विमर्श है एथनिक संघों की विवादित रणनीतियों पर जिनका मकसद उन्हें पहाड़ियों में बसे आदिम और स्वदेशी समूहों के रूप में पहचान दिलाना है। पुस्तक उन प्रथाओं को समेटे हुए है जिनके माध्यम से एथनिक समूह दुबारा अपनी पहचान सामने रख रहे हैं और रीति-रिवाजांे के मद्देनजर दुबारा उनके पूर्वजों को ढ़ूंढ रहे हैं।

डाॅ. छेत्री ने बताया, ‘‘इस परिदृश्य में यह पुस्तक दार्जिलिंग के एथनिक समूहों के प्रदर्शन और विवादास्पद दावों के बारे में महत्वपूर्ण पाठ्य सामग्री है। दार्जिलिंग में क्षेत्रीय और सामुहिक मान्यता के आधार पर एथनिक आंदोलन का कालांतर विश्लेषण भी इस पुस्तक में किया गया है।

पुस्तक में दर्शाया गया है कि ये मांगें किस तरह की होती हैं और दैनिक जीवन में लोग किन माध्यमों से सामूहिक और विशिष्ट पहचान के दावों की बात करते हैं। पुस्तक यह भी दर्शाती है कि दार्जिलिंग में उभरती एथनिक राजनीति से दक्षिण एशिया में मान्यता के लिए जारी ऐसे संघर्षों को समझने में बहुत मदद मिलेगी। पुस्तक की दलील है कि ‘एसटी’ की मान्यता के लिए हो रहे आंदोलन की रूप-रेखा भारत में वर्गीकरण और कैटेगराइजेशन की समकालीन व्यापक राजनीति तय करती है और कथित मान्यता के जो मानक हैं उन पर दुबारा विचार करने की मांग की जा रही है।

यह पुस्तक उन शिक्षाविदों, छात्रों और शोध विद्वानों के लिए है जो राज्य के वर्गीकरण और कैटेगराइजेशन के राजनीतिक मुद्दों पर काम करते हैं। विशेष रूप से उनके लिए अधिक दिलचस्प होगी जो दक्षिण एशिया की जमीनी हकीकत समझने के लिए बहु-विषयी दृष्टिकोण रखते हैं। नीति बनाने वालों, सक्रिय कार्यकर्ताओं और कानून के छात्रों को भी इस पुस्तक में भारत के अंदर सांस्कृतिक अधिकारों और सकारात्मक प्रयासों के वर्गीकरण की प्रथाओं और संबंधित विमर्श से बहुत लाभ हो सकता है।

यह पुस्तक उत्तर उपनिवेशवादी विद्वानों, हिमालयी क्षेत्र में रुचि रखने वाले छात्रों और सामान्य रूप से दक्षिण एशियाई सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकता समझने को इच्छुक विद्वानों के लिए बहुत रोचक होगी। सैद्धांतिक विमर्श से भरपूर इस पुस्तक में अनुभव आधारित चित्रण भी है जो भारत में अनुसूचित जनजाति श्रेणी और वर्गीकरण की प्रथाओं को नए नजरिये से देखने का अवसर सामने रखता है।

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