बीएसएनके न्यूज / देहरादून डेस्क। सम्पर्क फाउंडेशन ने उत्तराखंड के शिक्षा विभाग के साथ मिलकर फेयरफील्ड बाय मैरियट में ‘एआई फॉर एजुकेशन इम्पैक्ट’ राज्य स्तरीय संवाद का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह द्वारा किया गया और उत्तराखंड के शिक्षा सचिव, आईएएस रविनाथ रमन ने स्वागत भाषण दिया।
इस संवाद में राज्य के कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए,रवि शंकर सिंह, मुख्य तकनीकी अधिकारी- आईटीडीए और राज्य ई-गवर्नेंस मिशन टीम- उत्तराखंड के प्रमुख, नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) में साइंटिस्ट ‘एफ’ शामिल थे। इसके अलावा आईआईटी रूड़की, आईआईएम काशीपुर, एनआईसी, यूटीयू, दून यूनीवर्सिटीज़ , डीआईटी यूनीवर्सिटीज़ जैसे संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। इस संवाद में सरकारी स्कूलों में बड़े स्तर पर काम कर रहे प्रैक्टिशनर्स के साथ-साथ एआई और नीति विशेषज्ञ भी शामिल हुए।
उत्तराखंड के माननीय राज्यपाल -लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने कहा, शिक्षा एक समान समाज की नींव है, और इसे सार्थक नवाचार के साथ मजबूत करना जरूरी है। चूंकि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारे सीखने और काम करने का अभिन्न हिस्सा बन गया है, इसलिए यह जरूरी है कि बच्चे इस बदलाव के साथ अच्छे से जुड़ सकें। अगर हम सावधानी से इस्तेमाल करें, तो एआई पढ़ाई-लिखाई के तरीके को बेहतर बना सकता है। इससे ऐसा सिस्टम बनेगा जो छात्रों की ज़रूरतों को समझेगा और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करेगा।
उत्तराखंड के शिक्षा सचिव आईएएस रविनाथ रमन ने कहा, “जैसे-जैसे हम बच्चों की शुरुआती पढ़ाई और बुनियादी गणित को बेहतर बना रहे हैं, हमें ऐसे तरीके अपनाने चाहिए जो व्यावहारिक हों, बड़े स्तर पर लागू किए जा सकें और शिक्षकों व छात्रों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए हों। ऐसी तकनीक जो पढ़ाई की सामग्री को सही तरीके से पहुँचाने में मदद करती है और जानकारी देती है, उससे बेहतर योजना बनाने और फैसले लेने में मदद मिलती है, जिससे क्लास में पढ़ाई का स्तर सुधर सकता है।
सम्पर्क फाउंडेशन ने टेक्नोलॉजी आधारित शिक्षा में अपने 20 साल पूरे करते हुए उत्तराखंड में अपने प्रयासों को और तेज़ कर दिया है। राज्य से गहरे जुड़ाव के चलते—जहां इसके संस्थापक अनुपमा और विनीत नायर का संबंध राज्य से है—फाउंडेशन ने यहां 36 करोड़ रूपये के निवेश के साथ सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर जोर दिया है। फिलहाल, फाउंडेशन राज्य में 13 लाख बच्चों तक पहुंच बना चुका है और 16,000 सरकारी स्कूलों में 90,000 से अधिक शिक्षकों को प्रशिक्षित कर चुका है। इसके अलावा, 4,300 स्मार्ट क्लासरूम स्थापित किए जा चुके हैं, जबकि 5,000 और क्लासरूम विकसित करने की योजना है, जिससे पढ़ने और सीखने के अनुभव को और मजबूत किया जा सके।
सम्पर्क फाउंडेशन के संस्थापक और चेयरमैन विनीत नायर ने कहा, “अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो एआई शिक्षकों की तैयारी को आसान बना सकता है और कक्षा में हर बच्चे के लिए सीखने को ज्यादा व्यक्तिगत बना सकता है। उत्तराखंड जैसे राज्यों के साथ हमारी साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है और हमारा ध्यान ऐसे क्लासरूम बनाने पर है, जहां जिज्ञासा बढ़े और सीखने के परिणाम वास्तविक और लंबे समय तक टिकाऊ तरीके से बेहतर हों। करीब दो दशक पहले हमने इस सोच के साथ शुरुआत की थी कि सरकारी स्कूल का हर बच्चा भी उतनी ही अच्छी शिक्षा का हकदार है, जितनी किसी बेहतरीन निजी स्कूल में मिलती है। तकनीक का काम इस लक्ष्य को आसान बनाना होना चाहिए, न कि इसे और जटिल बनाना।
उत्तराखंड की राज्य परियोजना निदेशक,दीप्ति सिंह ने कहा, “एआई का वास्तविक महत्व तभी है जब इसे स्कूल स्तर पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सके और कक्षा से मिलने वाले अनुभवों को सिस्टम स्तर पर बेहतर निर्णय लेने से जोड़ा जा सके।
इस कार्यक्रम में एक बेहद अहम सवाल पर चर्चा हुई कि जब भारत ने प्राथमिक शिक्षा में 95% से अधिक नामांकन हासिल कर लिया है और बड़े स्तर पर स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार कर लिया है, तो फिर इतने बच्चे बुनियादी शिक्षा और गणितीय कौशल के बिना क्यों आगे बढ़ रहे हैं, और क्या एआई इस स्थिति को बदल सकता है? एआई के हाइप से आगे बढ़ते हुए, संवाद में इस बात पर जोर दिया गया कि सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए शिक्षकों के स्किल्स को मजबूत करना जरूरी है, न कि उनकी जगह किसी और को देना। राष्ट्रीय विज़न को राज्य स्तर पर लागू करने की दिशा में, कार्यक्रम में एआई की भूमिका पर दो पैनल चर्चाएं भी आयोजित की गईं, जिनमें रियल-टाइम शिक्षा निर्णय प्रणाली में इसके उपयोग पर विचार साझा किए गए।
कार्यक्रम के अंत में, सम्पर्क फाउंडेशन के प्रेसिडेंट, डॉ के राजेश्वर राव ने फाउंडेशन के एक एआई-आधारित रियल-टाइम क्लासरूम मॉनिटरिंग एवं गवर्नेंस प्लेटफॉर्म लॉन्च करने की घोषणा की, जिसे देशभर के 80,000 सरकारी स्कूलों में मुफ्त में लागू किया जाएगा। इस प्लेटफॉर्म की मदद से जिला, ब्लॉक और स्कूल स्तर के शिक्षा अधिकारी यह देख पाएंगे कि क्लास में कैसी पढ़ाई हो रही है और बच्चे उसमें कितनी रुचि ले रहे हैं। यह उन स्कूलों की पहचान करने में भी मदद करेगा जो पढ़ाई में पीछे छूट रहे हैं। इससे बिना किसी कागजी बोझ के, सही जानकारी के आधार पर तेज़ी से फैसले लिए जा सकेंगे।


